5 फरवरी 2025 की सुबह सोशल मीडिया पर एक सनसनीखेज क्लिप घूमने लगी। पहाड़ों के बीच ऊंचाई से बंजी जंप करती एक महिला, हवा में झूलते हुए बेसुध दिखती है। कुछ ही मिनटों में अनजान अकाउंट्स ने इसे जोड़कर दावा ठोक दिया कि नोरा फतेही की बंजी जंपिंग के दौरान मौत हो गई। कैप्शन थे — टूटे-फूटे अंग्रेजी वाक्य, उकसाने वाला अंदाज, और तुरंत शेयर करने की अपील। देखते ही देखते वीडियो लाखों व्यूज़ पार कर गया।
घबराए फैंस के मैसेज लगातार आने लगे, लेकिन थोड़ी ही देर में तस्वीर साफ हो गई। एक्टर की टीम ने औपचारिक बयान देकर साफ कर दिया कि वह पूरी तरह सुरक्षित हैं और जिन दावों के साथ वीडियो फैलाया गया, वे मनगढ़ंत हैं। मैनेजमेंट ने इसे डिजिटल मिसइन्फॉर्मेशन का घटिया उदाहरण बताया और कहा कि ऐसे क्लिप जानबूझकर डर और एंगेजमेंट बढ़ाने के लिए फैलाए जाते हैं।
फैक्ट-चेकर्स ने भी जांच में हाथ लगाया। की-फ्रेम निकालकर रिवर्स सर्च की गई, बैकड्रॉप और जंपिंग रिग के डिटेल्स मैच कराए गए। शुरुआती संकेत यही दिखाते हैं कि वीडियो या तो पुराना है या संदर्भ से काटकर जोड़ा गया है, और इसे झूठे दावे के साथ री-अपलोड किया गया। प्लेटफॉर्म्स ने नीतियों के मुताबिक क्लिप को डिमोट, फ्लैग और कई जगहों से हटाया।
यह अकेला मामला नहीं है। सेलेब्रिटी डेथ होक्स हर कुछ महीने में ट्रेंड बना देते हैं। पैटर्न वही: चौंकाने वाला वीडियो, अस्पष्ट कैप्शन, नकली शॉक वैल्यू, और शेयर का बटन। कुछ अकाउंट्स के लिए यह फॉलोअर्स बटोरने और विज्ञापनों से कमाई का शॉर्टकट है, जबकि स्पैम नेटवर्क के लिए यह ट्रैफिक बढ़ाने की ट्रिक। नतीजा — असली लोगों को अनावश्यक तकलीफ और डिजिटल स्पेस में भरोसे की गिरावट।
यह भी ध्यान रखने लायक है कि वीडियो में दिख रही शख्सियत की पहचान साफ नहीं है, न ही स्थान और तारीख की पुष्टि होती है। बंजी जंपिंग में कई लेयर की सेफ्टी रहती है — हार्नेस, डबल अटैचमेंट, ऑपरेटर सुपरविजन। क्लिप में दिख रही बेहोशी जैसी स्थिति को मौत कह देना बिना प्रमाण का डर फैलाने वाला दावा है। यही मिसइन्फॉर्मेशन की जड़ है — संदर्भ बदला, दावा बढ़ा-चढ़ाकर, और बिना स्रोत के वायरल।
सोशल मीडिया की एल्गोरिदमिक दुनिया में एंगेजमेंट ही ईंधन है। जितना ज्यादा गुस्सा, डर या हैरानी — उतना ज्यादा रीशेयर। डेथ होक्स उसी मनोविज्ञान पर खेलते हैं। जब मशहूर चेहरे को लेकर झूठ फैलता है, तो ऑडियंस का भावनात्मक जुड़ाव उसे और तेजी से आगे धकेल देता है।
कानूनी नजर से देखें तो ऑनलाइन भ्रामक सामग्री फैलाना, किसी की पहचान का दुरुपयोग करना या धोखे से ट्रैफिक बटोरना — भारत के आईटी नियमों और साइबर अपराध कानूनों के दायरे में आ सकता है। प्लेटफॉर्म्स की अपनी नीतियां भी हैं — मैनिपुलेटेड मीडिया, गलत मृत्यु की घोषणा और पहचान की नकल पर कार्रवाई। शिकायत दर्ज होने पर पोस्ट हटना, रीच घटना और अकाउंट पर पेनल्टी आम हैं।
फैक्ट-चेकिंग के टूल और ट्रिक अब आम यूजर्स के लिए भी सुलभ हैं। यह पांच मिनट का काम है, लेकिन झूठ का फैलाव यहीं रुक सकता है।
5 फरवरी का दिन कुछ यूं बीता — सुबह वीडियो उभरा, दोपहर तक हैशटैग ट्रेंड करने लगे, और शाम तक मैनेजमेंट की ओर से स्पष्ट कर दिया गया कि सब अफवाह है। इसके बाद कई प्लेटफॉर्म्स ने कंटेंट हटाया या विजिबिलिटी कम की। कई फॉलोअर्स ने कमेंट सेक्शंस में फर्जी दावों की शिकायतें दर्ज कीं।
ऐसी घटनाएं सिर्फ एक स्टार या उसके फैंस की समस्या नहीं हैं। यह डिजिटल भरोसे का मसला है। जब गलत मौत की खबर चलती है, परिवार और करीबी लोगों पर उसका मानसिक असर पड़ता है। साथ ही, असली खबरों की साख भी चोट खाती है। इसलिए जिम्मेदारी सिर्फ प्लेटफॉर्म्स की नहीं — यूजर्स की भी है कि वे अपनी टाइमलाइन को भरोसेमंद बनाएं।
टीम की ओर से साफ किया गया है कि कलाकार स्वस्थ हैं और काम में जुटी हैं। आगे अगर किसी जांच एजेंसी या प्लेटफॉर्म से औपचारिक अपडेट आता है, तो कहानी वहीं से आगे बढ़ेगी। फिलहाल जो निष्कर्ष है, वह साफ है — वायरल क्लिप मिसकैप्शन के साथ फैलाया गया और इसे सच मानकर शेयर करना गलती होगी।
सोशल मीडिया पर सच की रफ्तार झूठ से कम क्यों पड़ती है, यह प्रश्न पुराना है। लेकिन जवाब आज भी वही है — धैर्य, जांच और जिम्मेदारी। तीनों मिलकर ही झूठ का रास्ता रोकते हैं।